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253वीं बार होगा रामलीला का आयोजन, मंच नहीं बल्कि प्रसंग के अनुरूप मैदान में होता है जीवंत मंचन

13 दिन तक रामायण की चौपाइयों पर प्रस्तुत होते हैं प्रसंग, लंका दहन, गेंदा युद्ध और रावण की विशाल प्रतिमा रहती है आकर्षण

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कौशाम्बी: सिराथू तहसील के शहजादपुर गांव की रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। मुगलकाल से चली आ रही इस परंपरा का इस वर्ष 253वीं बार आयोजन किया जाएगा। खास बात यह है कि यहां रामलीला के लिए कोई स्थायी मंच या रंगमंच तैयार नहीं किया जाता। जिस प्रसंग का मंचन होता है, कलाकार उसी भाव और स्थान के अनुरूप खुले मैदान या निर्धारित स्थल पर पहुंचकर उसे जीवंत करते हैं। यही मंचविहीन और स्थल आधारित प्रस्तुति शहजादपुर की रामलीला को अन्य आयोजनों से अलग पहचान देती है।

गांव के बुजुर्ग गंगा प्रसाद शुक्ल व श्रीनाथ जायसवाल बताते है कि काशी से आए कालीचरण पांडेय ने शहजादपुर में रामलीला मंचन की नींव रखी थी। वह स्वयं हनुमान की भूमिका निभाते थे। गांव के उत्तर गंगा नदी के किनारे उन्होंने कुटिया बनाकर निवास किया था। इसी कारण आज भी उस स्थान को हनुमानन घाट के नाम से जाना जाता है। पीढ़ियों से ग्रामीण इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं।

13 दिन तक चौपाइयों में जीवंत होती है रामकथा

प्राचीन रामलीला कमेटी के तत्वावधान में 13 दिवसीय रामलीला का आयोजन किया जाता है। मुकुट पूजन से शुरू होने वाला आयोजन राजगद्दी तक पहुंचता है। गांव के कलाकार और ग्रामीण ही विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते हैं। संवाद और अभिनय रामायण की चौपाइयों पर आधारित होते हैं। चौपाई का गायन होते ही कलाकार उसी के भाव और प्रसंग के अनुरूप अभिनय शुरू कर देते हैं।

मंच नहीं, स्थल ही बन जाता है रंगमंच

शहजादपुर की रामलीला की सबसे खास परंपरा इसका मंचविहीन स्वरूप है। यहां किसी एक स्थान पर मंच बनाकर नाटक प्रस्तुत नहीं किया जाता। राम-सीता विवाह का प्रसंग हो तो उसके अनुरूप स्थल पर कलाकार पहुंचते हैं, गंगा किनारे का प्रसंग हो तो हनुमानन घाट पर प्रस्तुति होती है और लंका दहन का दृश्य लंका मैदान में जीवंत किया जाता है। इस दौरान दर्शक भी प्रसंग के साथ स्थल बदलते हुए रामकथा का हिस्सा बनते हैं। कलाकार अभिनय के माध्यम से ऐसा वातावरण तैयार करते हैं कि दर्शकों को पूरा प्रसंग अपनी आंखों के सामने घटित होता प्रतीत होता है।

भंवर की रस्म में होता है राम-सीता विवाह

राम-सीता विवाह का मंचन भी यहां पारंपरिक अंदाज में किया जाता है। विवाह के प्रसंग को भंवर की रस्म के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। धार्मिक परंपरा और लोक संस्कृति के इस अनूठे मेल को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटते हैं।

हनुमानन घाट से जुड़ी है ऐतिहासिक स्मृति

रामलीला के कई प्रमुख प्रसंग गंगा किनारे स्थित हनुमानन घाट से जुड़े हैं। इसी स्थान पर कालीचरण पांडेय के निवास की स्मृतियां आज भी ग्रामीणों के बीच मौजूद हैं। गंगा की धारा के किनारे होने वाला मंचन धार्मिक वातावरण को और प्रभावी बना देता है।

लंका दहन में उमड़ता है जनसैलाब

नवमी के दिन लंका मैदान में होने वाला लंका दहन रामलीला का प्रमुख आकर्षण रहता है। हनुमान की भूमिका निभाने वाले कलाकार मैदान में दौड़ते हुए विभिन्न स्थानों पर प्रतीकात्मक रूप से आग लगाते हैं। इस दौरान जय श्रीराम के उद्घोष से पूरा मैदान गूंज उठता है। आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग इस दृश्य को देखने पहुंचते हैं।

एयरफोर्स की नौकरी से छुट्टी लेकर हनुमान बनते हैं अरविंद

रामलीला में हनुमान की भूमिका निभाने वाले अरविंद तिवारी एयरफोर्स में कार्यरत हैं। रामलीला के प्रति उनकी आस्था ऐसी है कि वह हर वर्ष नौकरी से अवकाश लेकर शहजादपुर पहुंचते हैं और हनुमान का पात्र निभाते हैं। उनके अभिनय में जोश और जीवंतता दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित करती है। देशसेवा के दायित्व के साथ अपनी गांव की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े रहना इस रामलीला के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।

विशाल रावण की प्रतिमा भी रहती है आकर्षण

लंका मैदान में स्थापित रावण की विशाल प्रतिमा भी रामलीला के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है। विजयादशमी पर राम-रावण युद्ध के दौरान विशाल प्रतिमा की मौजूदगी पूरे आयोजन को भव्य रूप प्रदान करती है।

गेंदों की मार से होता है गेंदा युद्ध

विजयादशमी के दिन मेघनाथ-लक्ष्मण युद्ध से पहले राम और रावण की सेनाओं के बीच पारंपरिक गेंदा युद्ध होता है। सुतली से तैयार गेंदों से दोनों पक्षों के सेनानी एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं। गेंदा युद्ध के लिए रेफरी नियुक्त किया जाता है और उसकी अनुमति से ही यह शुरू तथा समाप्त होता है। यह अनूठी परंपरा दर्शकों में खासा रोमांच पैदा करती है।

मेघनाथ-लक्ष्मण युद्ध के बाद राम-रावण महासंग्राम

गेंदा युद्ध के बाद मेघनाथ और लक्ष्मण के बीच युद्ध का मंचन होता है। इसके बाद राम और रावण के बीच महासंग्राम प्रस्तुत किया जाता है। विजयादशमी के दिन लंका मैदान में लगने वाला विशाल मेला आयोजन की भव्यता को और बढ़ाता है। आसपास के सैकड़ों गांवों से लोग रामलीला देखने के साथ मेले में खरीदारी के लिए पहुंचते हैं।

पीढ़ियों से ग्रामीण संजोए हैं विरासत

आधुनिक मनोरंजन के दौर में भी शहजादपुर की रामलीला अपनी प्राचीन परंपरा को पूरी श्रद्धा से संजोए हुए है। रामायण की चौपाइयों पर आधारित मंचन, ग्रामीण कलाकारों की सहभागिता, स्थल के अनुरूप जीवंत अभिनय और पारंपरिक प्रसंगों ने इसे क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बना दिया है। 253वीं बार होने जा रहा यह आयोजन बताता है कि समय बदला, मनोरंजन के साधन बदले, लेकिन शहजादपुर की रामलीला से जुड़ी आस्था और परंपरा आज भी उसी उत्साह के साथ कायम है।

अध्यक्ष का वर्जन

कुलदीप पांडेय, अध्यक्ष, रामलीला कमेटी ने कहा कि शहजादपुर की रामलीला सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है, जिसे पीढ़ियां आगे बढ़ाती आ रही हैं। 253वीं बार भी इस परंपरा को उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाएगा। हमारी कोशिश है कि रामलीला की मौलिकता और इसकी जीवन्त प्रस्तुति बरकरार रहे। धार्मिक आस्था और संस्कृति के रूप में मिली इस विरासत को आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है। यहां मंच बनाकर नाटक करने के बजाय प्रसंग के अनुरूप स्थल पर ही रामकथा को जीवंत किया जाता है और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।