कौशांबी : प्राचीन भारतीय गुरुकुल परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान देना नहीं, बल्कि शिष्य में सोचने, समझने, व्यवहार करने और जीवन की चुनौतियों से निपटने की क्षमता विकसित करना था। इसी भावना को आधुनिक शिक्षा पद्धति से जोड़ते हुए विकासखंड मूरतगंज में चल रहे बुनियादी साक्षरता एवं संख्याज्ञान (एफएलएन) प्रशिक्षण में शिक्षकों को गतिविधि आधारित और बाल केंद्रित शिक्षण के गुर सिखाए जा रहे हैं। प्रशिक्षण के दो बैचों में करीब 100 शिक्षक-शिक्षिकाएं प्रतिभाग कर रहे हैं। प्रशिक्षण के तीसरे दिन एसआरजी डा. ओम प्रकाश सिंह ने अनुश्रवण कर शिक्षकों का मार्गदर्शन किया।
डा. ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि ‘यथा बीजं तथा वृक्षः’, अर्थात जैसा बीज होगा, वैसा ही वृक्ष विकसित होगा। इसी प्रकार प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चों की भाषा, पठन-पाठन और गणितीय समझ की नींव जितनी मजबूत होगी, उनकी आगे की शैक्षिक यात्रा उतनी ही सुदृढ़ होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षक बच्चों को केवल सवालों के उत्तर बताने तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें देखने, सोचने, प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और स्वयं निष्कर्ष तक पहुंचने का अवसर दें।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि शिष्य को सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है। आज का शिक्षक भी इसी परंपरा का आधुनिक संवाहक है। बच्चों की जिज्ञासा को दबाने के बजाय उसे सीखने का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
अर्जुन की एकाग्रता और एकलव्य के अभ्यास से मिला सीखने का संदेश
प्रशिक्षण के दौरान महाभारत के अर्जुन की एकाग्रता का उदाहरण देते हुए शिक्षकों को बच्चों की व्यक्तिगत सीखने की जरूरत पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश दिया गया। वहीं एकलव्य के प्रसंग के माध्यम से निरंतर अभ्यास, आत्मप्रेरणा और सीखने के प्रति लगन की महत्ता समझाई गई। प्रशिक्षकों ने बताया कि प्रत्येक बच्चा अलग गति और तरीके से सीखता है। ऐसे में शिक्षक को उसकी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार सीखने के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए।
संदर्शिका और कार्यपुस्तिका बनीं शिक्षण की मजबूत साथी
प्रशिक्षण में संदर्शिका और कार्यपुस्तिका के प्रभावी प्रयोग पर विशेष जोर दिया गया। शिक्षकों को बताया गया कि इन संसाधनों का उद्देश्य केवल गतिविधियां पूरी कराना नहीं है, बल्कि बच्चों की वास्तविक सीखने की स्थिति को समझकर उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देना है। गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की सहभागिता बढ़ाने और उनके सीखने का आकलन करने के तरीकों पर भी चर्चा की गई।
चित्र, चार्ट और पोस्टर से जीवंत हुई कक्षा
प्रशिक्षण में चित्र, चार्ट, पोस्टर और अन्य शिक्षण-अधिगम सामग्री के माध्यम से भाषा एवं गणित की कठिन अवधारणाओं को सरल और रोचक बनाने की गतिविधियां कराई गईं। शिक्षकों को बताया गया कि बालमन स्वभाव से जिज्ञासु होता है। यदि पाठ्यवस्तु को कहानी, चित्र, खेल और गतिविधि से जोड़ दिया जाए तो बच्चे उसे आसानी से समझते हैं और लंबे समय तक याद भी रखते हैं।
भारतीय परंपरा में पंचतंत्र की कहानियों के माध्यम से कठिन जीवन-मूल्यों को सहज भाषा में समझाने की पद्धति का उदाहरण देते हुए बताया गया कि कक्षा में स्थानीय परिवेश और बच्चों के दैनिक अनुभवों को सीखने से जोड़ना प्रभावी साबित होता है। इससे बच्चे केवल पाठ को पढ़ते नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन से जोड़कर समझने का प्रयास करते हैं।
शिक्षकों ने गतिविधियों में बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा
प्रशिक्षण के दौरान शिक्षक-शिक्षिकाओं ने विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता की और अपने विद्यालयों के अनुभव साझा किए। प्रशिक्षण में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि एफएलएन का लक्ष्य केवल बच्चों को पढ़ना और गिनना सिखाना नहीं, बल्कि उनमें समझ, अभिव्यक्ति, तर्क और समस्या समाधान की बुनियादी क्षमता विकसित करना है।
प्रशिक्षण में संदर्भदाता नरेश कुमार, प्रशांत, आलोक, विजय वर्मा, दिलीप, जिम्मी, व्योमेश आदि शामिल रहे। प्रशिक्षण का मूल संदेश रहा कि गुरुकुल की आत्मा, आधुनिक शिक्षा की पद्धति और बालमन की जिज्ञासा का समन्वय ही प्रभावी एफएलएन की पहचान है।
इस प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षकों में एफएलएन की अवधारणा, गतिविधि आधारित शिक्षण और निपुण लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रति समझ विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि मूरतगंज के विद्यालयों में प्रत्येक बच्चा पढ़ने-समझने के साथ बुनियादी गणितीय दक्षताओं को आत्मविश्वास के साथ अर्जित कर सके।
