कौशाम्बी: चंद्रशेखर सिंह आयुर्वेद संस्थान, कोईलहा में मंगलवार को दो दिवसीय नाड़ी परीक्षण कार्यशाला के द्वितीय सत्र का आयोजन किया गया। मुंबई के नाड़ी विशेषज्ञ वैद्य विनायक टायडे व वैद्य शिवांगी मिश्रा ने चिकित्सकों और छात्रों को विभिन्न रोगों में नाड़ी परीक्षण की उपयोगिता, रोग निदान में इसकी भूमिका के बारे में जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि नाड़ी हाथ के अंगूठे नीचे देखनी चाहिए और संभव हो तो सुबह खाली पेट देखनी चाहिए । यदि तीव्र गति से चल रही है तो वात के रोग होने की संभावना है यदि नाड़ी की गति मेंढक की तरह अधिक उछाल की है तो पित्तज रोग व यदि मंद है और हंस की तरह चल रही है तो कफ के रोग होते हैं ।
कार्यशाला के दौरान रोगियों के लिए विशेष नाड़ी परीक्षण शिविर भी लगाया गया। इसमें रोगियों की नाड़ी का परीक्षण कर उनकी स्वास्थ्य स्थिति का आकलन किया गया। विशेषज्ञों ने नाड़ी परीक्षण के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों और इसके व्यावहारिक उपयोग की जानकारी भी साझा की। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर एसएन सिंह ने कहा कि आयुर्वेद चिकित्सा में नाड़ी परीक्षा रोग निदान का बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण माध्यम है। चिकित्सकों के लिए नाड़ी परीक्षण का ज्ञान रोगी की स्थिति को समझने में काफी उपयोगी साबित होता है। कार्यक्रम का संचालन वैद्य नरेंद्र कुमार पांडेय ने किया। इस अवसर पर उप-प्राचार्य प्रोफेसर प्रभात कुमार तिवारी, डा. अमित सिंह, डा. राजीव सिंह आदि मौजूद रहे।
